जय हिंद
तिरंगे के साए में न्याय का संकल्प
जहाँ सूरज की पहली किरण
सरहद पर खड़े जवान को छूती है,
वहीं से भारत की असली कहानी
हर दिन फिर से शुरू होती है।
बर्फ़ीली चोटियाँ हों या तपता रेगिस्तान,
समंदर की लहरें हों या घना जंगल,
हर हाल में अडिग खड़ा रहता है
भारत माँ का सच्चा प्रहरी—जवान।
वह बंदूक थामे खड़ा है,
पर दिल में केवल देश है,
उसके सपनों से पहले
भारत का भविष्य विशेष है।
जब वह घर से निकलता है,
तो पीछे रह जाते हैं माँ–बाप,
पत्नी की नम आँखें,
और बच्चों के अधूरे ख़्वाब।
देश की रक्षा में जो सब कुछ दे दे,
क्या वह न्याय से वंचित रह सकता है?
क्या उसके अधिकारों की लड़ाई में
उसे अकेला छोड़ा जा सकता है?
नहीं—कभी नहीं।
क्योंकि देशभक्ति केवल शब्द नहीं,
बल्कि ज़िम्मेदारी होती है,
वीर जवान के सम्मान की रक्षा
हम सबकी साझी जिम्मेदारी होती है।
जब सेवा से जुड़े प्रश्न उठें,
या पेंशन और सम्मान अटक जाए,
जब कानून की भाषा कठिन लगे,
और सच भी कहीं भटक जाए।
तब ज़रूरत होती है उस आवाज़ की
जो न्याय के लिए खड़ी हो निर्भीक,
जो कानून को सेवा बनाए,
और सेवा को देशभक्ति की सीख।
दिल्ली की हर जिला अदालत में
एक संकल्प है अडिग और स्पष्ट—
वीर जवानों और उनके परिवारों को
निःशुल्क कानूनी सहायता, पूर्ण और निष्पक्ष।
सेवा विवाद हों या अधिकारों की लड़ाई,
पेंशन, लाभ या वेतन की बात,
पारिवारिक उलझनें हों या अपील,
हर कदम पर मिलेगा न्याय का साथ।
क्योंकि जो तिरंगे के लिए जीता है,
उसे न्याय की चौखट पर
कभी झुकना नहीं चाहिए,
कभी भटकना नहीं चाहिए।
मनोज कुमार शर्मा, एडवोकेट
एफ-73, कड़कड़डूमा कोर्ट, दिल्ली
सशस्त्र बलों के जवानों
और उनके परिवारों के लिए
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देशभक्ति, सम्मान और समर्पण के साथ।
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